Year: 2025
Type: article
Abstract: मानव सभ्यता के विकास के प्रारंभिक काल से आज तक जितने भी लोकनायक हुए, राम इन सभी में महानायक हैं। लोकदृष्टा तुलसीदास का मानना है कि सभी प्राणियों में साक्षात् राम आत्मवत् हैं। वही जीवन के केन्द्र में है, सारा संसार उनकी रचनात्मक चेतना का प्रतिबिम्ब है। इसीलिए तुलसी ने लिखा है- सिया राम मय सब जानी। करौं प्रणाम जोरि जुग पानी।। अयोध्या नगरी से प्रारंभ हुई युवराज राम की जनचेतना की सांस्कृतिक यात्रा में प्रकृति का भरपूर योगदान रहा है। यह लोक जागरण यात्रा कई नदियों के किनारे विभिन्न भाषा-भाषी अनेक जातियों को जोड़ती हुई, अनेक पर्वतमालाओं और गंगा-यमुना के मैदानों से गुजरती हुई दण्डकारण्य, पंचवटी, किष्किन्धा और रामेश्वरम् होती हुई श्रीलंका पहुँचती है। मानो इसमें लोक जीवन, लोक संस्कृति और प्रकृति के उपहारों की त्रिवेणी समाहित है। संस्कृति की इस यात्रा में राजसत्ता पर लोकजीवन का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। यहाँ प्रकृति के साथ पारिवारिक रिश्तों का लंबा सिलसिला चलता है। वनवास काल में पेड़, पहाड़, नदियां और वन्य प्राणी सभी सीता एवं राम के सहयोगी बनते है। ये सभी उस विराट परिवार के सदस्य है, जिसके मुखिया स्वयं राम है। इसलिए यहाँ राम एवं सीता का सख्य भाव केवल शबरी, गिद्ध, जटायु अथवा वानरों तक ही सीमित नहीं है; वह तो सरयू, गंगा और गोदावरी जैसी नदियों, जलाशयों और वृक्षों से लेकर व्यापक वन-सौन्दर्य तक फैला हुआ है।
Language: English
Topic: Indian and Buddhist Studies
Subfield: Religious studies
Field: Arts and Humanities
Domain: Social Sciences
Open Access status: diamond
OpenAlex ID: W4416590247
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