भरतय भषए और रषटरय एकत
Year: 2026
Type: article
Abstract: भारत भाषायी विविधता का अनूठा उदाहरण है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं, जो केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक निरंतरता और सामाजिक एकता की आधारशिला हैं। भारतीय भाषाएँ राष्ट्रीय चेतना के निर्माण, लोकतांत्रिक सहभागिता और सांस्कृतिक समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह एक ऐसा बहुभाषिक राष्ट्र है जहाँ भाषायी विविधता केवल सामाजिक यथार्थ ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान का भी मूल तत्व है। भारतीय भाषाएँ सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, लोकज्ञान और ऐतिहासिक चेतना की वाहक रही हैं। राष्ट्रीय एकता की अवधारणा भारत में किसी एकरूपता पर नहीं, बल्कि विविधताओं के सामंजस्य पर आधारित है। भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है। यहाँ प्राचीन काल से ही विभिन्न भाषाओं का विकास समानांतर रूप से होता रहा है। वैदिक संस्कृत से लेकर प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं तक की यात्रा भारतीय सभ्यता की निरंतरता को दर्शाती है। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में भाषाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जहाँ एक ओर भाषाई अस्मिता ने क्षेत्रीय चेतना को जन्म दिया, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता की चुनौती भी प्रस्तुत की। ऐसे में भारतीय भाषाओं और राष्ट्रीय एकता के संबंध का अध्ययन प्रासंगिक हो जाता है। यह शोध पत्र भारतीय भाषाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संवैधानिक स्थिति, सामाजिक सांस्कृतिक योगदान तथा राष्ट्रीय एकता में उनकी भूमिका का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। साथ ही, भाषायी विविधता से उत्पन्न चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों का विश्लेषण भी किया गया है।
Source: ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA)
Author: विष्णुभाई मेराभाई जोगराणा
Language: English
Subfield: Linguistics and Language
Field: Social Sciences
Domain: Social Sciences
Open Access status: diamond
OpenAlex ID: W7125253444
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